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त्रिदेवों मे सर्वश्रेष्ठ कौन....?

 

त्रिदेवों मे सर्वश्रेष्ठ कौन हैं
Rahulguru
नमस्कार मित्रो

              त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ कौन....? अर्थात ब्रह्मा विष्णु और महेश में सबसे महान कौन है, क्योंकि ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता है तो विष्णु जी पालनकर्ता और महाकाल अर्थात शिवजी संघारकर्ता, तीनों देवों के गुण अलग-अलग जरूर हैं लेकिन तीनों देव एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि सृष्टि का निर्माण करके यदि बिना पालनकर्ता के छोड़ दिया जाए तो हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि क्या होगा, और बिना सृष्टि के निर्माण के पालन कर्ता का कोई काम नहीं, और यदि मान लो सृष्टि का निर्माण भी ब्रह्माजी द्वारा कर दिया गया, विष्णु जी अपने पालनकर्ता का धर्म बखूबी निभा रहें हो, लेकिन उसके संघार कर्ता ही ना हो तो आप कल्पना कीजिए कि क्या होगा,

 अतः हम कह सकते हैं कि त्रिदेवों में से कोई एक देव यदि अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए तो बाकी दोनों देव भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकते, एक बार यही विषय ऋषियों के समूह में चर्चा का विषय बना हुआ था, कोई ब्रह्मा जी को सर्वश्रेष्ठ बताता, कोई विष्णु को तो कोई महेश को, ज़ब इसका निर्णय नहीं पाया, तब सभी नैमिषारण्य निवासी मुनि ब्रह्मा जी के पास जाते हैं इस समस्या के समाधान हेतु, जहां पर परमपिता ब्रह्मा जी कह रहे होते हैं, कि" उन भगवान अनंत को नमस्कार हैं जिनका कहीं अंत नहीं मिलता तथा जो सबके महान ईश्वर हैं, उन महान शंकर जी को भी नमस्कार है, यह दोनों देवता सदैव मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें,

जब सभी मुनियों ने परमपिता ब्रह्मा जी को विष्णु जी और शिव जी की स्तुति करते देखा, तो सभी ने सोचा कि जब स्यंम परमपिता ब्रह्मा जी विष्णु जी और शिव जी को अपना आराध्य मानते हैं, तो निश्चय ही विष्णु जी और शिव जी ब्रह्मा जी से श्रेष्ठ होंगे, यही विचार करके सभी मुनि भगवान विष्णु से मिलने क्षीरसागर में गए, लेकिन जैसे ही वें विष्णु जी के पास पहुंचे, तो देखते हैं कि विष्णु जी स्तुति कर रहे हैं और कह रहे थे कि" मैं संपूर्ण भूतों मैं व्यापक परब्रह्मस्वरूप ब्रह्मा और सदाशिव को प्रणाम करता हूं, यह दोनों मेरे लिए मंगलकारी है सदा ही इनका आशीर्वाद मुझे प्राप्त होता, रहे जब मुनियों ने ऐसा सुना तो वें विस्मय में पड़ गए कि यहां तो स्वयं विष्णु जी परमपिता ब्रह्मा और शिव जी को सर्वश्रेष्ठ बता रहे हैं,

अतः सभी मुनि अशांत मन के साथ कैलाश पर्वत पर गए वहां पहुंचकर सभी ऋषियों ने देखा कि भगवान शंकर माता पार्वती से कह रहे हैं कि" हे देवी मैं भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी की प्रसन्नता के लिए विष्णु जी के मंदिर में एकादशी को जागरण पूर्वक नृत्य करता हूं, तथा उन्हीं दोनों देवों की प्रसन्नता के लिए सदैव तपस्या करता हूं, यह सुनकर सभी मुनियों का सिर चकरा गया और अभिलंब सारे मुनि वहां से खिसक आए,

आश्रम पहुंचकर आपस में कहते हैं कि " जब त्रिदेव ही एक दूसरे से पार नहीं पाते तब उनके द्वारा उत्पन्न किए हुए महर्षियों की संतान परंपरा में जन्म लेने वाले हम लोगों की क्या मजाल है, जो इन त्रिदेव में से किसी एक को उत्तम मध्यम या अधम बतलाए, जो इन त्रिदेव में उत्तम मध्यम या अधम का भेद करते या बताते हैं निश्चित ही उसे नरक लोक में जलना पड़ेगा, भले ही वह कितना बड़ा धर्मात्मा हो क्योंकि यह त्रिदेव एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि जब स्वयं त्रिदेव ही एक दूसरे को अपना आराध्य मानते हैं तो हम मनुष्य भला उनमें भेद कैसे कर सकते हैं, 

नोट :- इसका संपूर्ण वर्णन स्कंदपुराण के महेश्वरखंड-कुमारिकाखंड मे किया गया हैं..? 

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