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भीम के पुत्र बर्बरीक का वध श्री कृष्ण ने क्यों किया.... ?

 

बर्बरीक की कहानी
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नमस्कार दोस्तों

             बर्बरीक जो कि भीमसेन के पुत्र घटोत्कच का पुत्र था, जिसने कहा था कि वह कौरवों की सेना का विनाश क्षण मात्र में कर सकता है, जिसे सुनकर श्री कृष्ण ने बर्बरीक का वध कर दिया था लेकिन ऐसा क्यों किया था श्रीकृष्ण ने...? इसका संपूर्ण वर्णन स्कंद पुराण के माहेश्वरखंड-कुमारिकाखंड में किया गया आइए जानते हैं उस पौराणिक कथा के बारे में..? 

पौराणिक कथा :-

               पांडवों के वनवास का तेरहवाँ वर्ष समाप्त हो जाने पर जब कौरव और पांडव सेना सहित युद्ध के मैदान में आमने-सामने हुई है तो उस समय पितामह भीष्म जी ने रथियों और महारथियों की गणना की, जिसकी सूचना अपने गुप्तचरों के द्वारा राजा युधिष्ठिर को लगी तो वें अपने पक्ष के राजाओं से और श्रीकृष्ण से कहते हैं कि" हे मधुसूदन भीष्म पितामह ने रथियों और महारथियों की गणना का वर्णन किया है, जिसे सुनकर दुर्योधन ने अपने सभी महारथियों पूछा हैं कि कौन महारथी कितने समय में पांडवों को सेना सहित मार सकता है, 

जिसके उत्तर में पितामह भीष्म और कृपाचार्य ने एक माह में हम सब को मारने का प्रण किया है, द्रोणाचार्य ने 15 दिन में और अश्वथामा ने 10 दिनों में, तथा सदा मुझे भयभीत करने वाले कर्ण ने 6 दिनों में पांडवों को सेना सहित मारने की घोषणा की है, अतः यही प्रश्न मैं अपने महारथियों के सामने रखता हूं बताओ मुझे कौन कितने समय में कौरवों को सेना सहित मार सकता है, तब अर्जुन कहते हैं " महाराज यह बात सर्वथा असंगत है क्योंकि युद्ध से पहले किया गया निश्चय झूठा होता है, और जब हमारे पक्ष मे द्रुपत, विराट, बलशाली भीम, पुत्र सहित घटोत्कच आदि तथा कभी ना परास्त होने वाले स्वयं श्रीकृष्ण साथ हो तो हमें किसका भय है,

लेकिन फिर भी आपकी मन की शांति के लिए यदि आप जानना ही चाहते हैं तो सुनिए मैं अकेला ही इस युद्ध में कौरवों को सेना सहित 1 दिन में नष्ट कर सकता हूं, तभी हंसते हुए बर्बरीक कहता है "हे पितामह महात्मा अर्जुन ने जो प्रतिज्ञा की है वह मुझे सही नहीं जान पड़ती क्योंकि इनके द्वारा दूसरे वीरों का अपमान हो रहा है, अतः आप लोग बस चुपचाप खड़े रहिए मैं एक ही क्षण में भीष्म सहित सभी कौरवों को यमलोक पहुंचा सकता हूं, जिसे सुनकर अर्जुन लज्जित आंखों से कृष्ण की ओर देखने लगे,

तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि " हे पार्थ घटोत्कच के पुत्र ने अपनी शक्तियों के अनुरूप ही बात कही है क्योंकि पूर्वकाल में इसने पाताल लोक में जाकर 9 करोड़ पलाशी नामक दैत्यों को क्षण भर में मौत के घाट उतार दिया था, हे बर्बरीक बताओ मुझे तुम किस उपाय से कौरवों के महान महारथियों को क्षण मात्र में मार सकते हो, तब बर्बरीक ने एक बाण उठाया जिसमें लाल रंग का भस्म भरा हुआ था और कान तक खींच कर छोड़ दिया, बाण के मुख से जो भस्म उड़ा वह दोनों तरफ की सेनाओं के मर्म स्थानों पर जा गिरा, केवल पांच पांडव, कृपाचार्य, भीष्म, कर्ण और श्रीकृष्ण के शरीर से उसका स्पर्श नहीं हुआ,

ऐसा करके बर्बरीक पुनः सब लोगों से कहता है कि" देखा आप लोगों ने इस क्रिया के द्वारा मैंने मरने वाले वीरों के मर्म स्थानों का निरीक्षण किया अब उन्हीं मर्म स्थानों में मैं देवी के दिए हुए अमोघ बाण मारूंगा, जिससे यह सभी योद्धा क्षण भर में मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे आप सभी को सौगंध है धर्म की, कदापि शस्त्र ग्रहण ना करें मैं दो ही घड़ी में इन सभी का बढ़ कर दूंगा, यह देखकर चारों तरफ कोलाहल मच गया सभी बर्बरीक की वीरता का बखान करने लगे, लेकिन तभी क्रोधित श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का मस्तक धड़ से अलग कर दिया, एक क्षण के लिए चारों तरफ सन्नाटा छा गया सभी पांडव और घटोत्कच हा पुत्र हा पुत्र कह कर रोने लगे,

तभी वहां देवी चंडिका प्रकट होती हैं और घटोत्कच को सांत्वना देते देते हुए कहती हैं कि " हे वीरों श्री कृष्ण ने जो बर्बरीक का वध किया इसके पीछे महान कारण था, तथा इसके पूर्व जन्म के कर्म थे वह मैं बताती हूं सुनो,, एक बार मेरु पर्वत पर सभी देवता इकट्ठा हुई है तभी वहां बोझ से पीड़ित पृथ्वी आई और बोली "हे देवताओं आप लोग कोई भी उपाय करके मेरे ऊपर के भार को कम करो अन्यथा मैं 1 दिन रसातल में पहुंच जाऊंगी,,

जिसे सुनकर ब्रह्मा जी विष्णु से कहते हैं कि " हे भगवान अब आप ही पृथ्वी का भार कम करें, सारे देवता आप का अनुसरण करेंगे,तब विष्णु जी ने ब्रह्मा की बात मान ली लेकिन तभी सूर्यवर्चा नामक यक्षराज ने अपना हाथ उठाकर कहा कि आप लोग मेरे रहते मनुष्य लोग ने क्यों जन्म धारण करेंगे, मैं अकेला ही अवतार लेकर पृथ्वी के भारभूत सभी दैत्यों का संघार करूंगा, जिसे सुनकर ब्रह्मा जी को बहुत क्रोध आया और बोले" रे दुर्बुद्धि पृथ्वी का भार उतारना समस्त देवताओं के लिए भी असंभव है और तू अकेले ही पृथ्वी का भार उतारने का दम्भ भरता है, मूर्ख पृथ्वी का भार उतारने के लिए जब युद्ध छिड़ेगा उसी समय श्रीकृष्ण के द्वारा तेरे शरीर का नाश होगा,

ऐसा श्राप ब्रह्मा जी द्वारा प्राप्त करके सूर्यवर्चा विष्णु जी से याचना करता है कि " हे भगवान यदि इसी प्रकार मेरे शरीर का नाश होता है तो मेरी प्रार्थना है कि जन्म से ही मुझे ऐसी बुद्धि दीजिए जो सब अर्थों को सिद्ध करने वाली हो, तब भगवान विष्णु ने कहा ठीक है ऐसा ही होगा तुम पुजय्नीय हो जाओगे, विष्णु जी के ऐसा कहने पर आप सभी देवता इस पृथ्वी पर अवतरित हुई है सूर्यवर्चा ही बर्बरीक है जो मारा गया, अतः तुम सभी को श्री कृष्ण को दोष नहीं देना चाहिए.

तब श्रीकृष्ण कहते हैं " राजन देवी ने जो बात कही है वह शत प्रतिशत सत्य है तत्पश्चात कृष्ण जी कहते हैं कि " हे देवियों बर्बरीक के सिर को अमृत से खींचकर अजर अमर बना दो जैसे कि राहु का सिर अमर है,, तब देवियों ने वैसा ही किया जीवित होने पर उस मस्तक ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करके कहा " हे भगवन मैं इस विराट महाभारत के युद्ध को देखना चाहता हूं इसकी अनुमति दीजिए मुझे, तो फिर कृष्ण गंभीर वाणी में कहते हैं कि वत्स जब तक यह पृथ्वी सूर्य चंद्रमा रहेंगे तब तक तुम सब लोगों द्वारा पूजनीय हों,

अब तुम इस पर्वत शिखर पर निवास करो वहीं से होने वाले महाभारत की युद्ध को देखना, तब बर्बरीक का मस्तक पर्वत के शिखर पर स्थित हो गया बर्बरीक के शरीर का विधिपूर्वक दाह संस्कार किया गया, बर्बरीक के मस्तक ने पर्वत के ऊपर से ही महाभारत के 18 दिनों का युद्ध देखा,

सोचो अगर बर्बरीक जैसा चाहता था वैसा हो गया होता तो महाभारत युद्ध का क्या परिणाम होता, क्योंकि बर्बरीक द्वारा उस भयंकर नरसंहार में केवल पांच पांडव, कृपाचार्य, अश्वथामा, कर्ण, भीष्म, श्री कृष्ण ही बचते बाकी कोई नहीं बचता, यही कारण था कि भगवान श्रीकृष्ण को बर्बरीक का वध करना पड़ा, 

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