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घटोत्कच का विवाह और बर्बरीक का जन्म,

 

Mahabharata
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नमस्कार दोस्तों

         महाभारत मे अनेक महान योद्धाओं का वर्णन आता हैं, सभी के सभी एक से बढ़कर एक, इसी क्रम मे घटोत्कच और बर्बरीक थे, घटोत्कच के विवाह की कहानी जितनी रोचक हैं उतनी ही रोचक कथा बर्बरीक के जन्म की हैं, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के महेश्वरखण्ड - कुमारिकाखंड मे किया हैं, आइये जानते हैं इस कथा को विस्तार से.....? 

पौराणिक कथा :-

         एक बार भगवान कृष्ण सहित सभी पांडव राजसभा में बैठकर संपूर्ण राज्य का ब्यौरा ले रहे थे कि तभी वहां भीमपुत्र घटोत्कच का आगमन होता है, जिसे देख कृष्ण सहित सभी पांडव उठकर घटोत्कच को गले से लगाते हैं और सभी घटोत्कच का हाल-चाल पूछते हैं, तभी एकाएक युधिष्ठिर कृष्ण से कहते हैं कि" हे मधुसूदन आप तो जानते ही हैं, कि घटोत्कच जन्म के साथ ही युवावस्था को प्राप्त हो गया था, अतः मैं चाहता हूं कि इस पुत्र के योग्य पत्नी प्राप्त हो, आप तो सर्वज्ञ हैं बताइए इस के योग्य पत्नी कौन हो सकती है,

तब कुछ सोच विचार करके कृष्ण कहते हैं "राजन घटोत्कच के योग्य बहुत सुंदर स्त्री है जो इस समय प्रगज्योतिषपुर में निवास करती है, वह मुर नामक दैत्य की पुत्री है उस मुर नामक दैत्य को मैंने अपने हाथों से मारा था, दैत्य के मरने के बाद उसकी पुत्री स्वयं मुझसे युद्ध करने के लिए युद्ध क्षेत्र में आई, वह अत्यंत पराक्रमी होने के कारण उसमें बड़ी भयंकर जान पड़ती थी, उस खड्ग और खेटक धारण करने वाली दैत्य पुत्री के साथ मैंने महासमर में युद्ध किया, मैंने अपने धनुष से तमाम बाण छोड़े लेकिन मुर की पुत्री ने उन सभी बाणों को अपने खड्ग से काट डाला, तब मैंने उसके वध के लिए सुदर्शन चक्र उठाया,

तभी मेरे सामने कामाख्या देवी आकर खड़ी हो गई और बोली " हे मधुसूदन आपको इसका वध नहीं करना चाहिए, क्योंकि मैंने स्वयं इसे अपना खड्ग और खेटक प्रदान किया है जो अजेय है, देवी कामाख्या की बात सुनकर मैंने कहा " देवी ठीक है मैं ही युद्ध से विरक्त होता हूं तुम इस कन्या को मना करो, तब कामाख्या देवी ने उस कन्या को अपने हृदय से लगा लिया और बोली " पुत्री यह स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं यह अजेय हैं, और भविष्य में तुम इनके भाई भीमसेन की पुत्रवधू बनोगी, यह तुम्हारे भावी ससुर हैं इन्होने ही तुम्हारे पिता को उन्होंने मोक्ष प्रदान किया, इसके हाथों से वध होने के कारण तुम्हारे पिता विष्णुलोक में वास करेंगे, अतः क्रोध त्याग कर इनसे आशीर्वाद ग्रहण करो,

तब उसने क्रोध त्याग कर मुझे प्रणाम किया, और उसे आशीर्वाद देकर मैं द्वारिका वापस आ गया, अतः हे राजन वही कन्या घटोत्कच के लिए उपयुक्त रहेगी, मैं उसका ससुर हूं इसलिए मेरे द्वारा उसके रूप का वर्णन करना सर्वथा अनुचित है, एक बात और सुन लो राजन उस कन्या ने प्रतिज्ञा कर रखी है कि" जो पुरुष उसे निरुत्तर कर देगा तथा जो मेरे ही समान बलवान हो वही मेरा पति होगा, उसकी प्रतिज्ञा सुनकर अनेक दैत्य और राक्षस उसके पास गए लेकिन उसने उन सभी को परास्त करके मार डाला,  घटोत्कच यदि उस कन्या को जीतने का उत्साह रखते हैं तो वह अवश्य ही इनकी पत्नी बनेगी,

तब युधिष्ठिर कहते हैं कि" प्रभु ऐसे तमाम गुणों का क्या लाभ जिसमें एक महान अवगुण हो, लेकिन अर्जुन और भीम सेन की सहमति पाकर श्री कृष्ण कहते हैं " हिडिंबाकुमार घटोत्कच तुम्हारी क्या राय है तब घटोत्कच कहता है " प्रभु मैं सर्वदा ऐसी चेष्टा करूंगा कि मेरे पांडव पिता को मुझ पुत्र के कारण सतपुरुषों की सभा में लज्जित ना होना पड़े, यह कहकर घटोत्कच ने सभी से आशीर्वाद लिया और प्रागज्योतिषपुर की ओर निकल पड़ा और दिन बीते बीते वह प्रगज्योतिषपुर पहुंच भी गया, वहां जाने पर घटोत्कच ने सोने का एक सुंदर महल देखा जिसकी ऊंचाई हजार मंजिला की थी, उसके दरवाजे पर एक निशाचरी पहरा दे रही थी,

जिसे देख घटोत्कच ने कहा कि "हे कल्याणी मुर की पुत्री कहां है, मैं उसकी कामना करने वाला तुम्हारा अतिथि हूं, मैं उसे देखना चाहता हूं, घटोत्कच की बात सुनकर वह कन्या भागती हुई मुरकन्या के पास गई और बोली " हे देवी कोई सुंदर काम का अतिथि होकर द्वार पर खड़ा है, मेरे लिए क्या आज्ञा है तब मुरकन्या बोली " अरे मंदबुद्धि उसे शीघ्र यहां लेकर आ क्या पता उसी के द्वारा मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो जाए, तब उसने निशाचरी ने घटोत्कच को मुरकन्या के पास भेजा,

जब घटोत्कच ने उस कन्या को देखा तो सोचने लगा कि प्रभु श्री कृष्ण ने अति उत्तम स्त्री को मेरे लिए चुना है, ऐसा विचार करके घटोत्कच मुरकन्या से बोला कि " ओ बज्र के समान कठोर हृदय वाली नारी आज मैं तुम्हारा अतिथि हूं, मेरा सतपुरुषों की भांति उचित आदर सत्कार करो, जिसे सुनकर कन्या बोली "  अरे भद्र पुरुष तुम व्यर्थ ही यहां चले आए, जीते जी सुख पूर्वक यहां से लौट जाओ और यदि मुझे पाने की कामना लेकर आए हो तो शीघ्र ही कोई कथा कहो जिसका उत्तर मेरे पास ना हो, यदि मैं उसका उत्तर ना बता पाई तो सदा तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूंगी और यदि उत्तर दे दिया तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है,

तब घटोत्कच बोला " रे निष्ठुर नारी सुन..? मान लो किसी पत्नी के गर्भ से बालक उत्पन्न हुआ जो युवा होकर आजितेंद्रिय निकला, उस युवक से एक पुत्री उत्पन्न हुई और उसकी पत्नी मर गई, तब पिता ने उसका पालन पोषण किया वह करने जब जवान हुई और उसके सभी अंग विकसित हो गए, तब उसके पिता का मन उसके प्रति काम से ग्रसित हो गया, तत्पश्चात उस पापी ने अपनी ही पुत्री से कहा " प्रिय तुम मेरे पड़ोसी की लड़की हो, मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिए यहां दीर्घकाल तक तुम्हारा पालन पोषण किया था, अब मेरा वह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो, उस पापी के ऐसा कहने पर उस लड़की ने ऐसा ही माना, और उसने अपने ही पिता को पति रूप में स्वीकार कर लिया, तत्पश्चात उस कामी पापी से एक कन्या उत्पन्न हुई, अब तुम बताओ वह कन्या उस पापी पुरुष की क्या लगेगी पुत्री या दौहित्री....?

यह सुनकर मुरकन्या ने अनेक प्रकार से विचार किया, लेकिन ज़ब उत्तर ना मिला तो वह कन्या हाथ में तलवार लेकर घटोत्कच पर झपटी, लेकिन घटोत्कच ने कन्या के बाल पकड़कर धरती पर पटक दिया और फिर उसके गले पर बाया पैर रखकर नाक कान काटने का विचार करने लगा, लेकिन तभी कन्या ने जब मंद स्वर में कहा कि " हे नाथ मैं तुम्हारे प्रश्नबल और शक्ति से परास्त हो गई हूं, अब मैं तुम्हारी दासी हुई, तब घटोत्कच उस कन्या को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ पहुंचा,

जहां पर श्री कृष्ण सहित सभी पांडवों ने दोनों का विवाह करवा दिया, विवाह के कुछ समय पश्चात ही कन्या के गर्भ से एक महातेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही जवान हो गया और अपने माता-पिता से बोला " मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूं एक बालक के आदिगुरु माता पिता ही होते हैं, अतः आप दोनों के नाम को मैं ग्रहण करना चाहता हूं, तब घटोत्कच अपने पुत्र को गले से लगाकर कहता है " पुत्र तुम्हारे केस घुंघराले हैं इसलिए तुम्हारा नाम बर्बरीक होगा,

यह बर्बरीक वही बालक है जो मात्र क्षण भर में ही पूरा महाभारत युद्ध खत्म कर सकता था, 

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