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महाबली भीम को प्राणदान दिया था इस राक्षस ने ...?

 

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महाभारत 
नमस्कार दोस्तों

        भीमसेन जिनमें 10000 हाथियों का बल था वह भी एक राक्षस से हुए थे परास्त, उस राक्षस ने भगवान शंकर के कहने पर भीमसेन को प्राण दान दिया था जिसका वर्णन स्कंद पुराण के माहेश्वर कुमारी का खंड में किया गया है,

पौराणिक कथा :-

         यह कथा उस समय की है जब सभी पांडव कौरव से जुए में अपना सारा राजपाट हार जाते हैं और समस्त राजपाट का त्याग करके तीर्थों की यात्रा पर निकलते हैं, इसी क्रम मे वें चंडिका देवी के दर्शन करते हैं और थके मांदे होने के कारण वहीं बैठ जाते हैं, उस समय चंडिका का गण भी वही विराजमान था जोकि एक राक्षस था, सभी पांडव जलपान करने के उद्देश्य से वहां रुके थे अतः अपनी गठरी आदि वही खोल दी,

तभी भीमसेन पानी पीने के लिए कुंड में घुसे, जिसे देख युधिष्ठिर कहते हैं " भीमसेन कुंड से पानी बाहर निकाल कर ही हाथ पैर धोना अन्यथा तुम्हें बड़ा दोष लगेगा, लेकिन भीमसेन युधिष्ठिर की बात पर ध्यान नहीं देते और शुद्धि के लिए कुंड में अपने हाथ पैर धोने लगे, जिसे देखकर देवी का गण जो एक राक्षस था कहता है कि "ओ दुर्बुद्धि तुम यह क्या कर रहे हो, देवी के कुंड में हाथ पैर और मुंह धो रहे हो, मैं देवी को सदा ही इसी जल में स्नान कराता हूं, मल से दूषित जल को तो मनुष्य भी नहीं छूते फिर देवी उसका स्पर्श कैसे कर सकती हैं, जब तुम इतने बड़े मूर्ख हो तो तीर्थों में क्यों घूम रहे हो,

भीमसेन कहते हैं "रे राक्षस जल तो होता ही उपभोग के लिए है, इसका दूसरा उपयोग ही क्या है, लोग बावड़ी कुआं बनवाते किस लिए हैं धर्म ग्रंथों में तीर्थों में स्नान करने का विधान है, और अपने अंगों को धोना भी तो स्नान कहा गया है, तब राक्षस कहता है " निःसन्देह तुम सत्य कह रहे हो लेकिन जिसके जल बहते रहते हैं उन्हीं में भीतर जाकर स्नान करना चाहिए, कुआ बावड़ी तालाब आदि जिनके जल स्थिर होते हैं, उनमें तो बाहर खड़े होकर स्नान करना उचित माना जाता है,

जहां भक्त देवता को स्नान कराने के लिए जल लेते हैं तथा जो देवस्थान से 100 हाथ से भी अधिक दूर बनाया गया हो, उसके भीतर प्रवेश करने से पहले दोनों हाथ पैर धो कर फिर स्नान करना बताया गया है, क्या ब्रह्मा जी द्वारा कही गई बात तुम्हें पता नहीं कि " जो जल में मल, मूत्र, कफ, थूक छोड़ते हैं, वह ब्रह्महत्यारे के समान है, इसलिए ओ दुराचारी तू शीघ्र ही जल से बाहर निकल,

जिसे सुनकर भीमसेन कहते हैं " कव्वे की तरह कांय कांय की वाणी से मेरे कान बहरे हो गए, अब तू चाहे यहां विलाप कर या चिंता के मारे सूख जा, मैं तो जल पीकर ही बाहर निकलूंगा, तब राक्षस कहता है कि " रे नीच मैं धर्म की रक्षा करने वाले क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हुआ हूं, इसलिए मैं यह पाप तुझे नहीं करने दूंगा, तू शीघ्र बाहर निकल नहीं तो से मैं तेरा सर चूर चूर कर दूंगा, लेकिन भीमसेन ने उसे अनसुना कर दिया और जैसे ही जल को अपनी अंजली में उठाया,

उस राक्षस ने भीम पर ईंटों से प्रहार करना प्रारंभ कर दिया अतः भीमसेन उसके प्रहार से बचने के लिए उछल पर कुंड से बाहर आ गए, फिर दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया दोनों आपस में गुथ गए, अब दोनों ही युद्ध विद्या में पारंगत थे अतः दोनों अपनी विशालकाय भुजाओं से एक दूसरे पर प्रहार करने लगे, लेकिन दो ही घड़ी में राक्षस के सामने भीम दुर्बल पड़ने लगे, अतः उस राक्षस ने भीमसेन को अपने दोनों भुजाओं से ऊपर उठा लिया और जल में फेंकने के लिए समुद्र की ओर निकल पड़ा,

लेकिन जैसे ही वह राक्षस भीमसेन को लेकर समुद्र तट पर पहुंचा, वहां भगवान शिव प्रकट हुए और बोले कि " हे राक्षसों में श्रेष्ठ बर्बरीक यह भरतकुल के रत्न और तुम्हारे पितामह भीमसेन है इन्हें छोड़ दो, असल में वह राक्षस घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक था, जिसे ना तो पांडव पहचानते थे और ना ही बर्बरीक पांडवों को पहचानता था, क्योंकि जन्म से लेकर अब तक पांडव और बर्बरीक मिले ही नहीं थे, अतः जब शंकर जी ने बर्बरीक को सच बताया,

तो वह भीमसेन के पैरों पर गिर पड़ा जिसे भीमसेन उठाकर छाती से लगा लेते हैं और कहते हैं वत्स जन्म से ही ना तो तुम हमें पहचानते हो और ना तो हम तुम्हें, मैं और मेरे पूर्वज धन्य है जिसका पुत्र ऐसा धर्मज्ञ है, अतः तुम यह शोक छोड़ दो, तब बर्बरीक कहता है " हे पितामह मैं पापी घृणा का पात्र हूं जो माता पिता का भक्त नहीं उसका कोई उद्धार नहीं कर सकता" अतः जिस शरीर से मैंने पितामह को पीड़ा पहुंचाई है उस शरीर को आज मैं त्याग दूंगा, ऐसा कहकर बर्बरीक समुद्र में कूद पड़ा, समुद्र भी यह सोचकर कांप गया कि कैसे मैं इसका वध करूं,

तभी वहां चारों दिशाओं की देवियां रुद्र के साथ प्रकट हुई, और बोली वत्स अनजाने में किए गए पाप से दोष नहीं लगता, देखो तुम्हारे पितामह भी तुम्हारे पीछे आ रहे हैं, तुम्हारी मृत्यु के पश्चात निश्चित ही वह भी अपने प्राण त्याग देंगे, जिससे तुम्हें बड़ा भारी दोष लगेगा, कुछ समय पश्चात देवकीनंदन कृष्ण के हाथों से तुम्हारे शरीर का नाश होगा, वह स्वयं विष्णु जी के अवतार है अतः तुम उस समय की प्रतीक्षा करो, देवियों के ऐसा कहने पर बर्बरीक उदास मन से वापस लौट आया,

तब भीमसेन बर्बरीक को साथ लेकर पांडवों के पास पहुंचे, और बर्बरीक की बहादुरी के बारे में सभी को बताया तब बर्बरीक ने सभी पांडव को बताया कि " उसने नवदुर्गा से वरदान स्वरुप ऐसा बल प्राप्त किया है जो तीनों लोकों में किसी के पास नहीं है उसी वरदान के कारण मैं पितामह को परास्त करने में सफल रहा, 

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