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श्री कृष्ण ने मारा था महाभारत के सभी योद्धाओं को...?

 

कृष्ण लीला

नमस्कार दोस्तों

         जैसा कि आप जानते हैं कि महाभारत युद्ध हर भारतीय के लिए गौरव गाथा रही है, इस युद्ध में महारथी कर्ण, द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और दुर्योधन जैसे वीर योद्धाओं ने वीरगति पाई थी, जबकि अश्वथामा श्राप के कारण आज भी जंगल मे भटकते रहते हैं, हम सभी जानते हैं कि महाभारत युद्ध में कौरवों का तथा उनकी तरफ से युद्ध लड़ने वाले योद्धाओं का वध पांडवों द्वारा किया गया था, लेकिन यदि हम आपको कहें कि ऐसा बिल्कुल नहीं था बल्कि समस्त कौरव योद्धा का वध कृष्ण द्वारा किया गया था, तो आप इसे सिरे से नकार देंगे, कतई नहीं मानेगे, लेकिन यह सत्य है कि कौरव पक्ष के समस्त योद्धाओं का वध स्वयं श्रीकृष्ण ने किया था, जिसका वर्णन स्कंदपुराण के माहेश्वरखंड-कुमारिकाखंड में किया गया है,

पौराणिक कथा :-

          इस रहस्य का खुलासा उस समय होता हैं जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया और युधिष्ठिर राजा बने, तब भरी सभा में युधिष्ठिर कहते हैं कि " हे मधुसूदन इस महान संग्रामसागर से आपने ही हम लोगों को पार उतारा, इसलिए मैं आपको साष्टांग प्रणाम करता हूं, अब भीमसेन थोड़ा उग्र स्वभाव के तो थे ही अतः जब युधिष्ठिर ने महाभारत में विजय पाने का सारा श्रेय श्री कृष्ण को दिया तो उनसे रहा न गया, और तुम बोले राजन धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने वाला तो मैं हूं, आप मेरा तिरस्कार करके कृष्ण कृष्ण की रट लगा रहे हैं, आखिर किया ही क्या है कृष्ण ने रथ हांकने के अलावा जो आप इनकी इतनी बड़ाई बतला रहे हैं,

भीमसेन की ऐसी बात सुनकर अर्जुन से भी न रहा गया और बोले " भ्राता श्री आप ऐसा बिल्कुल ना कहें, आप श्री कृष्ण को नहीं जानते हैं, मेरे आपके या किसी अन्य वीर योद्धा के द्वारा किसी भी शत्रु का वध नहीं किया गया, बल्कि युद्ध के समय मैं सदैव देखता था कि मेरे आगे आगे एक पुरुष शत्रुओं को मारता हुआ चला करता था मुझे पता नहीं वह कौन था, अर्जुन की बात सुनकर भीम बोले " अर्जुन तुम निश्चय ही किसी बड़े भ्रम में पड़े हो, भला युद्ध में दूसरा कौन हमारे शत्रुओं का नाश करेगा,

फिर भी यदि तुम्हें विश्वास ना हो तो चलो पर्वत शिखर पर स्थित पौत्र (नाती) बर्बरीक के मस्तक से पूछ लिया जाए उसने तो सारा युद्ध देखा ही है, तब सभी पांडव कृष्ण को साथ लेकर उस पर्वत पर गए जहां बर्बरीक का सिर स्थापित था, वहां पहुंचकर भीमसेन कहते हैं कि " बेटा तुमने तो सारा युद्ध देखा है अतः अब तुम ही बताओ कि कौरवों को किसने मारा, तब बर्बरीक कहता है कि " पितामह मैंने तो शत्रुओं के साथ केवल एक ही पुरुष को युद्ध करते हुए देखा, उस पुरुष के बाई ओर पांच मुख और 10 हाथ जिसमें आयुध धारण किए हुए था, दाहिनी ओर एक मुख और चार भुजाएं थी जो चक्र आदि शस्त्रों से सुसज्जित थी,

उसकी बाईं ओर का मस्तक जटाओं से सुसज्जित था और दाहिनी ओर मस्तक पर मुकुट चमचमा रहा था, बाईं ओर भस्म धारण कर रखी थी और दाएं ओर चंदन लगा रखा था, बाईं ओर चंद्रकला शोभा पा रही थी और दाएं ओर कौस्तुभमणि रोशनी बिखेर रही थी उस पुरुष के अतिरिक्त गौरववाहिनी का विनाश करते मैंने किसी को नहीं देखा बर्बरीक के ऐसा कहने पर आकाश मार्ग से फूलों की वर्षा होने लगी जिससे भीमसेन बड़े लज्जित हुए और कृष्ण से कहते हैं कि" हे मधुसूदन मैंने जन्म से लेकर अब तक जितने भी अपराध किए हैं उन सभी के लिए तुम मुझे क्षमा प्रदान करो, मैं तो मूर्ख हूं और आप अनंत ज्ञान के भंडार, मुझ पर सदैव अपनी कृपा बनाए रखें प्रभु,

श्री कृष्ण कहते हैं " अच्छी बात है वत्स मैं तुम्हें अभी सभी अपराधों से मुक्त करता हूं, इस प्रकार सभी की शंका का समाधान होता हुआ देख सभी पांडव प्रसन्नता पूर्वक अपने महल में वापस आ जाते हैं, 

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